अगर पत्नी बार-बार गुस्सा करती है तो पति को क्या करना चाहिए…..

अक्सर पति या पत्नी का क्रोध बड़े विवाद को जन्म देता है। क्रोध हमेशा ही नुकसानदायक होता है और इस भाव में व्यक्ति सही-गलत का फर्क भी भूल जाता है। गुस्से में कई बार ऐसे शब्द बोल दिए जाते हैं जो लंबे समय तक तकलीफ पहुंचाते हैं।

वैवाहिक जीवन में जीवन साथी के क्रोध का जवाब शांति के साथ देना चाहिए। यदि एक व्यक्ति गुस्से में है तो दूसरे को शांत रहकर बात को संभालने का प्रयास करना चाहिए। दोनों ही क्रोधित हो जाएंगे तो बात बिगड़ना तय है।

यहां जानिए प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात के वैवाहिक जीवन से जुड़ा बहुत प्रचलित एक किस्सा, किस प्रकार सुकरात ने गुस्से में रहने वाली पत्नी को शांत किया…
ये है चर्चित किस्सा

– महान यूनानी दार्शनिक सुकरात के व्यवहार में अहंकार नहीं था। वे बहुत लोकप्रिय, अत्यंत सहज, सहनशील और विनम्र स्वभाव के थे।

– नम्र स्वभाव के सुकरात की पत्नी बहुत गुस्से वाली थीं। वे छोटी-छोटी बात पर लड़ा करती थीं, लेकिन सुकरात शांत ही रहते थे। वे उनके तानों का कोई जवाब नहीं देते और दुर्व्यवहार की अति हो जाने पर भी कोई जवाब नहीं देते थे।
जब पत्नी ने सुकरात पर डाल दिया एक घड़ा पानी

– एक बार सुकरात अपने शिष्यों के साथ घर के बाहर बैठे थे। किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा चल रही थी। तभी घर के अंदर से उनकी पत्नी ने किसी काम के लिए उन्हें आवाज लगाई, लेकिन सुकरात चर्चा में इतने खोए हुए थे कि पत्नी की अावाज पर उनका ध्यान ही नहीं गया।

– सुकरात को पत्नी ने कई बार पुकारा, लेकिन वे खोए रहने के कारण नहीं सुन पाए। अब तो पत्नी का गुस्सा चरम पर पहुंच गया। उसने शिष्यों के सामने ही एक घड़ा पानी लाकर सुकरात पर डाल दिया।

– यह देखकर शिष्यों को बहुत बुरा लगा।

– सुकरात शिष्यों की भावना समझकर शांत स्वर में बोले- देखो, मेरी पत्नी कितनी उदार है, जिसने इस भीषण गर्मी में मेरे ऊपर पानी डालकर मुझे शीतलता प्रदान करने की कृपा की।
और पत्नी का क्रोध हो गया शांत

– अपने गुरु की सहनशीलता देख शिष्यों ने श्रद्धा के साथ प्रणाम किया और पत्नी का क्रोध भी शांत हो गया।

– पत्नी के गुस्से का जवाब सज्जनता से देने पर क्रोध शांत हाे जाता है और बड़े विवाद की स्थिति नहीं बनती। घर में शांति बनाए रखने के लिए इस बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए।

-अंशुमान सिंह “मौन”

-दूरभास नं.- 9200702051,

-9200702052

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माटी कहे कुम्हार से तू क्या रोंदे मोहे….

माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रोंदे मोहे,
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदूगी तोहे ।

आये हैं तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर,
एक सिंघासन चडी चले, एक बंदे जंजीर ।

दुर्बल को ना सतायिये, जाकी मोटी हाय,
बिना जीब के स्वास से लोह भसम हो जाए ।

चलती चक्की देख के दिया कबीर रोये,
दो पाटन के बीच में बाकी बचा ना कोई ।

दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे ना कोई,
जो सुख में सुनिरण करे, दुःख कहे को होए ।

पत्ता टूटा डाल से ले गयी पवन उडाय,
अबके बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय ।

कबीर आप ठागायिये और ना ठगिये,
आप ठगे सुख उपजे, और ठगे दुःख होए ।

इतनी शक्ति हमे देना दाता मन का विश्वास कमजोर हो ना…

इतनी शक्ति हमें देना दाता
मन का विश्वास कमजोर हो ना
हम चले नेक रस्ते पे हमसे
भूलकर भी कोई भूल हो ना

दूर अज्ञान के हो अंधेरे
तू हमें ज्ञान की रोशनी दे
हर बुराई से बचते रहें हम
जितनी भी दे भली ज़िन्दगी दे
बैर हो ना किसी का किसी से
भावना मन में बदले की हो ना

हम ना सोचें हमें क्या मिला है
हम ये सोचे किया क्या है अर्पण
फूल खुशियों के बाँटे सभी को
सब का जीवन ही बन जाए मधुबन
अपनी करुणा का जल तू बहा के
कर दे पावन हर एक मन का कोना

तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो…

तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो
तुम ही हो माता, पिता तुम ही हो
तुम ही हो बंधू, सखा तुम ही हो

तुम ही हो साथी, तुम ही सहारे
कोई ना अपना सिवा तुम्हारें
तुम ही हो नैय्या, तुम ही खिवय्या

जो खिल सके ना वो फुल हम हैं
तुम्हारें चरणों की धुल हम हैं
दया की दृष्टि सदा ही रखना

जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं….

जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं
इस ज़माने में, इस मोहब्बत ने
कितने दिल तोड़े, कितने घर फूँके
जाने क्यों लोग मोहब्बत किया करते हैं
दिल के बदले दर्द-ए-दिल लिया करते हैं

तनहाई मिलती है, महफ़िल नहीं मिलती
राह-ए-मोहब्बत में कभी मंज़िल नहीं मिलती
दिल टूट जाता है, नाकाम होता है
उल्फ़त में लोगों का यही अंजाम होता है
कोई क्या जाने, क्यों ये परवाने
यूं मचलते है, ग़म में जलते है
आहें भर भर के दीवाने जिया करते हैं

सावन मे आँखो को कितना रूलाती है
फ़ुर्क़त मे जब दिल को किसी की याद आती है
ये ज़िंदगी यूं ही बर्बाद होती है
हर वक़्त होठों पे कोई फ़रियाद होती है
ना दवाओं का नाम चलता है
ना दुवाओं से काम चलता है
ज़हर ये फिर भी सभी क्यों पिया करते हैं

मेहबूब से हर ग़म मनसूब होता है
दिन रात उल्फ़त में तमाशा खूब होता है
रातों से भी लंबे ये प्यार के किस्से
आशिक़ सुनाते हैं ज़फ़ा-ए-यार के किस्से
बेमुर्वत है, बेवफा है वो
उस सितमगार का अपने दिलबर का
नाम ले लेके दुहाई दिया करते हैं

हम तुम से जुदा हो के, मर जायेंगे रो रो के…

हम तुम से जुदा हो के, मर जायेंगे रो रो के

दुनिया बड़ी जालिम है, दिल तोड़ के हँसती है
एक मौज किनारे से मिलने को तरसती है
कह दो ना कोई रोके

सोचा था कभी दो दिल मिलकर ना जुदा होंगे
मालूम न था हम यूँ नाकाम-ए-वफ़ा होंगे
किस्मत ने दिये धोखे

वादे नहीं भूलेंगे, कस्में नहीं तोड़ेंगे
ये तय है के हम दोनो, मिलना नहीं छोड़ेंगे
जो रोक सके रोके

ये दुनिया, ये महफिल, मेरे काम की नहीं….

ये दुनिया, ये महफ़िल, मेरे काम की नहीं

किस को सुनाऊँ हाल दिल-ए-बेकरार का
बुझता हुआ चराग़ हूँ अपने मज़ार का

ऐ काश भूल जाऊँ, मगर भूलता नही
किस धूम से उठा था जनाज़ा बहार का

अपना पता मिले ना ख़बर यार की मिले
दुश्मन को भी ना ऐसी सज़ा प्यार की मिले
उनको खुदा मिले है खुदा की जिन्हे तलाश
मुझको बस एक झलक मेरे दिलदार की मिले

सहरा में आके भी मुझ को ठिकाना ना मिला

गम को भूलाने का कोई बहाना ना मिला
दिल तरसे जिस में प्यार को, क्या समझू उस संसार को
एक जीती बाजी हार के, मैं ढूँढू बिछड़े यार को

दूर निगाहों से आँसू बहाता है कोई

कैसे ना जाऊँ मैं, मुझको बुलाता है कोई
या टूटे दिल को जोड़ दो, या सारे बंधन तोड़ दो
ऐ परबत रस्ता दे मुझे, ऐ काँटों दामन छोड़ दो