दीपावली।

यह कविता भारतरत्न आदरणीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की है और दीपावली की शुभकामनाएं इससे ज्यादा अच्छी तरह व्यक्त नहीं की जा सकती।
सभी मित्रों एवं उनके परिवारजनों को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं…….

जब मन में हो मौज बहारों की
चमकाएँ चमक सितारों की,
जब ख़ुशियों के शुभ घेरे हों
तन्हाई में भी मेले हों,
आनंद की आभा होती है
*उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है ।*

जब प्रेम के दीपक जलते हों
सपने जब सच में बदलते हों,
मन में हो मधुरता भावों की
जब लहके फ़सलें चावों की,
उत्साह की आभा होती है
*उस रोज़ दिवाली होती है ।*

जब प्रेम से मीत बुलाते हों
दुश्मन भी गले लगाते हों,
जब कहींं किसी से वैर न हो
सब अपने हों, कोई ग़ैर न हो,
अपनत्व की आभा होती है
*उस रोज़ दिवाली होती है ।*

जब तन-मन-जीवन सज जाएं
सद्-भाव के बाजे बज जाएं,
महकाए ख़ुशबू ख़ुशियों की
मुस्काएं चंदनिया सुधियों की,
तृप्ति की आभा होती है
*उस रोज़ ‘दिवाली’ होती है .*।

आपको सादर सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 💐🙏💐🙏💐🙏🏻💐🙏🏻💐🙏🏻💐

अंशुमान सिंह।

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विजयदमी।

आज का दिन विजयादशमी जो कि पाप पर पूण्य की विजय का प्रतीक है श्री रामचन्द्र जी ने आज के दिन महाप्रतापी,महाज्ञानी दशानन रावण का वध नही किया बल्कि उसके घमंड ओर पाप का वध किया और विजय प्राप्त की इस अवसर को विजयादशमी में रूप में हम मानते है और हर साल पुतले के रूप में रावण का वध करते है मगर सोचने के लिए एक ही बात काफी है हम किसका वध करने जाते है उस रावण का जो कि अपने कुटुम्ब के लिए अपनी पूरी लंका तबा कर दी या उस रावण का जिसने अहंकार में आकर सीता जी को छल से हर कर लेकर गया ? हमे अपने अंदर के झूठ रूपी,अहंकार रूपी , छल, कपट , रूपी रावण को मारना है वरना रावण खुद इतना विद्वान था जिसको मारने की जरूरत नही अपनाने की जरूरत है आज हम सभी अपने अंदर के अहंकार रूपी रावण को मारे न कि उस रावण को जो कि महाप्रतापी है । हम अपने अंदर के छल रूपी रावण को मारे न कि उस अजय कुटुम्बकम को जो कि अपने परिवार के लिए एक स्तम्भ की तरह खड़ा रहा । आज हमें उस रावण को मारने की जरूरत है ,जिसने सारे समाज मे गंदगी फेला रखी है न कि उस रावण को जो तीनों लोकों में प्रसिद्वि लिए हुए जो भगवान शिव का अनन्य भक्त है जो हर मुश्किल में अपनों के साथ है ।

आप सभी जेष्ठ जनों को अच्छाई पर बुराई के प्रति जीत विजयादशमी की अनन्त शुभकामनाएं आप हमेशा अपनो के संघ रहे और अपने स्तम्भ मजबूत रखे यही कामनाओ के साथ मे आप सभी को एक बार फिर विजयादशमी की अनन्त अनन्त शुभकामनाएं देता हूं अपने से अनुज को बहुत प्यार दुलार ओर संस्कार के साथ आप सभी का छोटा सा सदस्य।

##अंशुमान सिंह##

🙏🏻🙏🏻

पिता और माता …………….।

•पिता की सख्ती को बर्दाशत करो, ताकी काबिल बन सको,

•पिता की बातें गौर से सुनो, ताकी दुसरो की न सुननी पड़े,

•पिता के सामने ऊंचा मत बोलो वरना भगवान तुमको नीचा कर देगा,

•पिता का सम्मान करो, ताकी तुम्हारी संतान तुम्हारा सम्मान करे,

•पिता की इज्जत करो, ताकी इससे फायदा उठा सको,

•पिता का हुक्म मानो, ताकी खुश हाल रह सको,

•पिता के सामने नजरे झुका कर रखो, ताकी भगवान तुमको दुनियां मे आगे करे,

•पिता एक किताब है जिसपर अनुभव लिखा जाता है,

•पिता के आंसु तुम्हारे सामने न गिरे, वरना भगवान तुम्हे दुनिया से गिरा देगा,
पिता एक ऐसी हस्ती है …!!!!

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माँ का मुकाम तो बेशक़ अपनी जगह है ! पर पिता का भी कुछ कम नही, माँ के कदमों मे स्वर्ग है पर पिता स्वर्ग का दरवाजा है, अगर दरवाज़ा ना ख़ुला तो अंदर कैसे जाओगे ?
जो गरमी हो या सर्दी अपने बच्चों की रोज़ी रोटी की फ़िक्र में परेशान रहता है, ना कोई पिता के जैसा प्यार दे सकता है ना कर सकता है, अपने बच्चों से !!

याद रख़े सूरज गरम ज़रूर होता है मगर डूब जाए तो अंधेरा छा जाता है, !!

आओ आज़ सब मिलकर उस अज़ीम हस्ती के लिए कामना करते है..|

हे भगवान मेरे पिता को अच्छी सेहत ओर तंदूरस्ती देना।

उनकी तमाम परेशानी को दूर कर, और उन्हें हमेंशा हमारे लिए खुश रख़ना।

इस संदेश को सभी लोगों तक पहुंचाया जाए…………….….।

अँग्रेजी से प्यार है ।

अँग्रेजी से प्यार है, हिंदी से परहेज,
ऊपर से हैं इंडियन, भीतर से अँगरेज

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अंतरपट में खोजिए, छिपा हुआ है खोट,
मिल जाएगी आपको, बिल्कुल सत्य रिपोट

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अंदर काला हृदय है, ऊपर गोरा मुक्ख,
ऐसे लोगों को मिले, परनिंदा में सुक्ख

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अक्लमंद से कह रहे, मिस्टर मूर्खानंद,
देश-धर्म में क्या धरा, पैसे में आनंद

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अंधा प्रेमी अक्ल से, काम नहीं कुछ लेय
प्रेम-नशे में गधी भी, परी दिखाई देय

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अगर फूल के साथ में, लगे न होते शूल
बिना बात ही छेड़ते, उनको नामाक़ूल

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अगर चुनावी वायदे, पूर्ण करे सरकार
इंतज़ार के मजे सब, हो जाएं बेकार

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मेरी भाव बाधा हरो, पूज्य बिहारीलाल
दोहा बनकर सामने, दर्शन दो तत्काल।

वंदन कर भारत माता का ।

वंदन कर भारत माता का, गणतंत्र राज्य की बोलो जय ।
काका का दर्शन प्राप्त करो, सब पाप-ताप हो जाए क्षय ॥

मैं अपनी त्याग-तपस्या से जनगण को मार्ग दिखाता हूँ ।
है कमी अन्न की इसीलिए चमचम-रसगुल्ले खाता हूँ ॥

गीता से ज्ञान मिला मुझको, मँज गया आत्मा का दर्पण ।
निर्लिप्त और निष्कामी हूँ, सब कर्म किए प्रभु के अर्पण ॥

आत्मोन्नति के अनुभूत योग, कुछ तुमको आज बताऊँगा ।
हूँ सत्य-अहिंसा का स्वरूप, जग में प्रकाश फैलाऊँगा ॥

आई स्वराज की बेला तब, \\\’सेवा-व्रत\\\’ हमने धार लिया ।
दुश्मन भी कहने लगे दोस्त! मैदान आपने मार लिया ॥

जब अंतःकरण हुआ जाग्रत, उसने हमको यों समझाया ।
आँधी के आम झाड़ मूरख क्षणभंगुर है नश्वर काया ॥

गृहणी ने भृकुटी तान कहा-कुछ अपना भी उद्धार करो ।
है सदाचार क अर्थ यही तुम सदा एक के चार करो ॥

गुरु भ्रष्टदेव ने सदाचार का गूढ़ भेद यह बतलाया ।
जो मूल शब्द था सदाचोर, वह सदाचार अब कहलाया ॥

गुरुमंत्र मिला आई अक्ल उपदेश देश को देता मैं ।
है सारी जनता थर्ड क्लास, एअरकंडीशन नेता मैं ॥

जनता के संकट दूर करूँ, इच्छा होती, मन भी चलता ।
पर भ्रमण और उद्घाटन-भाषण से अवकाश नहीं मिलता ॥

आटा महँगा, भाटे महँगे, महँगाई से मत घबराओ ।
राशन से पेट न भर पाओ, तो गाजर शकरकन्द खाओ ॥

ऋषियों की वाणी याद करो, उन तथ्यों पर विश्वास करो ।
यदि आत्मशुद्धि करना चाहो, उपवास करो, उपवास करो ॥

दर्शन-वेदांत बताते हैं, यह जीवन-जगत अनित्या है ।
इसलिए दूध, घी, तेल, चून, चीनी, चावल, सब मिथ्या है ॥

रिश्वत अथवा उपहार-भेंट मैं नहीं किसी से लेता हूँ ।
यदि भूले भटके ले भी लूँ तो कृष्णार्पण कर देता हूँ ॥

ले भाँति-भाँति की औषधियाँ, शासक-नेता आगे आए ।
भारत से भ्रष्टाचार अभी तक दूर नहीं वे कर पाए ॥

अब केवल एक इलाज शेष, मेरा यह नुस्खा नोट करो ।
जब खोट करो, मत ओट करो, सब कुछ डंके की चोट करो ॥

घूस माहात्म्य।

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचारऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा
जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा।

ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार
बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी
माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी
कहँ ‘काका’, क्या नाम पायेगा ऐसा बंदा
जिसने किसी संस्था का, न पचाया चंदा।

भ्रष्टाचार ।

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर ‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले – भागो, खत्म हो गया आटा।

‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर
पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला
खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला
कहँ ‘काका’ कवि, करके बंद धरम का काँटा
लाला बोले – भागो, खत्म हो गया आटा।